भोजन-पात्र विवेक dining table etiquettes

· भोजन के समय खाने व पीने के पात्र अलग-अलग होने चाहिए।
· काँसे के पात्र बुद्धि वर्धक, स्वाद अर्थात् रूचि उत्पन्न करने वाले हैं।
उष्ण प्रकृतिवाले व्यक्ति तथा अम्लपित्त, रक्तपित्त, त्वचाविकार, यकृत व
हृदयविकार से पीड़ित व्यक्तियों के लिए काँसे के पात्र स्वास्थ्यप्रद हैं। इससे
पित्त का शमन व रक्त की शुद्धि होती है।
· ‘स्कन्द पुराण’ के अनुसार चतुर्मास के दिनों में पलाश (ढाक) के पत्तों में या
इनसे बनी पत्तलों में किया गया भोजन चान्द्रायण व्रत एवं एकादशी व्रत के समान
पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है। इतना ही नहीं, पलाश के पत्तों में किया
गया एक-एक बार का भोजन त्रिरात्र व्रत के समान पुण्यदायक और बड़े-बड़े पातकों
का नाश करने वाला बताया गया है। चतुर्मास में बड़ के पत्तों या पत्तल पर किया
गया भोजन भी बहुत पुण्यदायी माना गया है।
· केला, पलाश या बड़ के पत्ते रूचि उत्पन्न करने वाले, विषदोष का नाश करने वाले
तथा अग्नि को प्रदीप्त करने वाले होते हैं। अतः इनका उपयोग हितावह है।
· लोहे की कड़ाही में सब्जी बनाना तथा लोहे के तवे पर रोटी सेंकना हितकारी है
इससे रक्त की वृद्धि होती है। परंतु लोहे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए
इससे बुद्धि का नाश होता है। स्टील के बर्तन में बुद्धिनाश का दोष नहीं माना
जाता। पेय पदार्थ चाँदी के बर्तन में लेना हितकारी है लेकिन लस्सी आदि खट्टे
पदार्थ न लें। पीतल के बर्तनों को कलई कराके ही उपयोग में लाना चाहिए।
· एल्यूमीनियम के बर्तनों का उपयोग कदापि न करें। वैज्ञानिकों के अनुसार
एल्यूमीनियम धातु वायुमंडल से क्रिया करके एल्यूमीनियम ऑक्साइड बनाती है, जिससे
इसके बर्तनों पर इस ऑक्साइड की पर्त जम जाती है। यह पाचनतंत्र, दिमाग और हृदय
पर दुष्प्रभाव डालती है। इन बर्तनों में भोजन करने से मुँह में छाले, पेट का
अल्सर, एपेन्डीसाईटिस, रोग, पथरी, अंतःस्राव, ग्रन्थियों के रोग,
हृदयरोग,दृष्टि की मंदता,
माईग्रेन, जोड़ों का दर्द, सर्दी, बुखार, बुद्धि की मंदता, डिप्रेशन, सिरदर्द,
दस्त, पक्षाघात आदि बीमारियाँ होने की पूरी संभावना रहती है। एल्यूमीनियम के
कुकर का उपयोग करने वाले सावधान हो जायें।
· प्लास्टिक की थालियाँ (प्लेट्स) व चम्मच, पेपर प्लेट्स, थर्माकोल की प्लेट्स,
सिल्वर फाइल, पोलीथिन बैग्ज आदि का उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
· पानी पीने के पात्र के विषय में ‘भावप्रकाश’ ग्रंथ में लिखा है कि पानी पीने
के लिए ताँबा, स्फटिक या काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। ताँबा तथा मिट्टी के
जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं
पीना चाहिए।

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